<p style="text-align: justify;">झुलसा रोग से प्रकाश संश्लेषण क्रियाओं के प्रभावित होने से उपज में 47 प्रतिशत तक नुकसान होता है। रोग के कारण अधिकतम प्रकोप तराई के राज्यों-हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल तथा देश के उत्तरी-पूर्वी राज्यों के सरसों उत्पादक क्षेत्रों में पाया जाता है। झुलसा या पर्णचित्ती रोग आल्टरनेरिया ब्रेसिकी नामक फफूंद से होता है, जोकि आल्टरनेरिया ब्रेसिसीकोला, आल्टरनेरिया राफेनी एवं आल्टरनेरिया अल्टरनाटा की तुलना में अधिक नुकसान पहुंचाता है। इस रोग से उपज एवं तेल की मात्रा को 10 प्रतिशत तक नुकसान पहुंचाता है। हानि की मात्रा कवक वृद्धि के लिए अनुकूल वातावरण पर निर्भर करती है। पिछले कुछ वर्षों से राजस्थान, हरियाणा, मध्य प्रदेश सहित कई क्षेत्रों में जलवायु बदलाव के प्रभाव से इस रोग के प्रकोप में कुछ कमी अवश्य देखी गयी है।</p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/cccpic.jpg" width="260" height="190" /></p> <h3 style="text-align: justify;">लक्षण</h3> <p style="text-align: justify;">बुआई के 40-45 दिनों बाद सर्वप्रथम निचली पत्तियों पर छोटे हल्के भूरे से काले रंग के सकेन्द्री वलय धब्बे बन जाते हैं। ये दिसंबर के अंत तक अनुकूल वातावरण मिलने पर आकार में बढ़कर पत्तियों पर फैलकर झुलसा देते हैं। धीरे-धीरे ये गहरे भूरे रंग के धब्बे तने, टहनियों और फलियों पर रोग की उग्रता की दर से फैल जाते हैं। ग्रसित फलियां सूखकर सिकुड़ जाती हैं और बीज का रंग भूरा एवं आकार छोटा हो जाता है। तेल की मात्रा में भी तुलनात्मक कमी आती है।</p> <h3 style="text-align: justify;">रोग का विकास</h3> <p style="text-align: justify;">इस रोग के कवक, ग्रसित पादप मलबे पर या अन्य परपोषी पौधों पर बीजाणुओं एवं कवक जाल बनाकर स्थायी बने रहते हैं। ये अनुकूल मौसम में प्राथमिक निवेश द्रव्य के प्रभावी स्रोत का कार्य करते हैं। रोग का प्राथमिक संक्रमण निचली पत्तियों पर प्रकट होता है। जनवरी-फरवरी में तापमान 20<sup>0</sup> से 25<sup>0</sup> सेल्सियस और आर्द्रता 90 प्रतिशत से अधिक होने पर प्राथमिक निवेश द्रव्य ही द्वितीयक संक्रमण का स्रोत बनता है। पौधों की सघनता और बारी-बारी से हल्की वर्षा अथवा अधिक सिंचाई रोग विकास को उग्रता प्रदान कर पौधों के दूसरे भागों को भी यह रोग ग्रसित करता है।</p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/ccccccpic5.jpg" width="190" height="300" /></p> <h3 style="text-align: justify;">रोग प्रबंधन</h3> <p style="text-align: justify;">प्राथमिक निवेश द्रव्य को कम करने के लिए पूर्व में बोई गई फसल के अवशेषों को एकत्रित कर नष्ट कर देना चाहिए। फसल पर प्रभावी कवकनाशी जैसे मैंकोजेब (2.5 प्रतिशत) अथवा आइप्रोडियॉन (रोवरोल) 0.25 प्रतिशत के घोल का छिड़काव बुआई के 45 एवं 75 दिनों बाद दो बार करने से आर्थिक हानि से बचा जा सकता है। फसल की बुआई समय पर (10-20 अक्टूबर) करने से रोग का प्रकोप कम रहता है। पर्यावरण में रासायनिक दुष्प्रभाव को रोकने के लिए 2 प्रतिशत लहसुन के सत्त का प्रयोग बुआई के 45 एवं 75 दिनों बाद में करने से रोग से होने वाली हानि को 35 प्रतिशत कम किया जा सकता है। सरसों की फसल में अधिक सिंचाई एवं रासायनिक खादों के प्रयोग से रोग का प्रभाव भी बढ़ता है। सिफारिशानुसार संतुलित खाद एवं पानी देना चाहिए।</p> <p style="text-align: justify;">स्त्रोत : प्रभु दयाल मीना, लक्ष्मण प्रसाद, पंकज शर्मा और प्रमोद कुमार रायभाकृअनुप-सरसों अनुसंधान निदेशालय, सोवर,भरतपुर-321303 (राजस्थान) भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली</p>